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या कुन्देन्दु तुषार हारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणा वरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माऽच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवै: सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती नि:शेष-जाड्यापहा।।

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मातृभाषा परित्यज्ये यो अन्यभाषामुपासते
तत्र यांति हि ते देश: यत्र सूर्यो न भासते।

जो अपनी मातृभाषा को त्यागकर अन्य
भाषाओं की उपासना करता है, वह देश
अंधकारमय हो जाता है तथा वहॉं कभी
ज्ञानरूपी सूर्य का प्रकाश नहीं फैलता है।





सरस्वती वंदना


हे शारदे मॉं, हे शारदे मॉं,
अज्ञानता से हमें तार दे मॉं।
तू स्वर की देवी है, संगीत तुझसे,
हर शब्द तेरा है, हर गीत तुमसे।
हम हैं अकेले, हम हैं अधूरे,
तेरी शरण में हमें तार दे मॉं।
हे शारदे मॉं...

मुनियों ने समझी, गुणियों ने जानी,
वेदों की भाषा, पुराणों की वाणी।
हम भी तो समझें, हम भी तो जानें,
विद्या का हमको अधिकार दे मॉं।
हे शारदे मॉं...

तू श्वेत वर्णी, कमल पे विराजे,
हाथों में वीणा, मुकुट सर पे साजे।
मन से हमारे, मिटा दे अंधेरे,
उजालों का हमको संसार दे मॉं।
हे शारदे मॉं...

 






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